शनिवार, 23 अप्रैल 2022

What Was Vernacular Press Act??


 

वर्नाक्यूलर प्रेस एक्ट, 1878 (Vernacular Press Act)

1857 की महान क्रांति का एक प्रमुख परिणाम था-शासक और शासितों के बीच संबंधों में कटता। 1858 के पश्चात यूरोपीय प्रेस ने सरकार की नीतियों का समर्थन किया तथा विवादास्पद मामलों में सरकारी पक्ष का साथ दिया, किंतु देशी भाषाओं के प्रेस सरकारी नीतियों के तीव्र आलोचक थे। लार्ड लिटन की प्रतिक्रियावादी नीतियों के कारण भारतीयों में सरकार के विरुद्ध तीव्र असंतोष था। 1876-77 में भीषण अकाल से एक ओर जहां लाखों लोग मौत के मुंह से समा गये, वहीं दूसरी ओर, जनवरी 1877 में दिल्ली में भव्य दरबार का आयोजन किया गया। इन सभी कारणों से भारतीयों में उपनिवेशी शासन के विरुद्ध घृणा की भावना निरंतर बढ़ रही थी। दूसरी ओर लॉर्ड लिटन ने यह निष्कर्ष निकाला कि भारतीयों में इस असंतोष का कारण मैकाले एवं मैटकॉफ की गलत नीतियां थीं। फलतः उसने भारतीयों की भावनाओं को दबाने का निर्णय लिया।

1878 के देशी भाषा समाचार-पत्र अधिनियम (वर्नाक्यूलर प्रेस एक्ट) को बनाने का उद्देश्य, भारतीय भाषाओं के समाचार-पत्रों पर सरकारी नियंत्रण स्थापित करना तथा राजद्रोही लेखों को दबाना एवं ऐसे प्रयास के लिये समाचार-पत्रों को दंडित करना था। इस अधिनियम के मुख्य प्रावधान निम्नानुसार थे

1. जिला दण्डनायकों (District magistrate) को यह अधिकार दिया गया कि वे स्थानीय सरकार की आज्ञा से किसी भी भारतीय भाषा के समाचार-पत्र के प्रकाशक या मुद्रक को बुलाकर बंधन-पत्र (Bond) पर हस्ताक्षर करने के लिये कह सकते हैं। इस बंधन-पत्र में यह प्रावधान था कि ये प्रकाशक या मुद्रक ऐसी कोई भी सामग्री प्रकाशित नहीं करेंगे, जिससे सरकार के विरुद्ध असंतोष भड़के अथवा साम्राज्ञी की प्रजा के विभिन्न जाति, धर्म और वर्ण के लोगों के मध्य आपसी वैमनस्य बढ़े।

दण्डनायक का निर्णय अंतिम होगा तथा उसके विरुद्ध किसी प्रकार की अपील की अनुमति नहीं होगी।

3. देशी भाषा का कोई समाचार-पत्र यदि इस अधिनियम की कार्यवाही से बचना चाहे तो उसे पहले से अपने पत्र की एक प्रमाण प्रति (Proof copy) सरकारी पत्रेक्षण को देनी होगी।

इस अधिनियम को ‘मुंह बंद करने वाले अधिनियम’ की संज्ञा दी गयी। इस अधिनियम का सबसे घृणित पक्ष यह था कि-

(i) इसके द्वारा अंग्रेजी एवं देशी भाषा के समाचार-पत्रों के मध्य भेदभाव किया गया था; एवं

(ii) इसमें अपील करने का कोई अधिकार नहीं था।

 

इस अधिनियम के तहत भारत मिहिर, सोम प्रकाश, सहचर, ढाका प्रकाश तथा अनेक अन्य समाचार पत्रों के विरुद्ध मामले दर्ज किये गये।

कालांतर में (सितम्बर 1878 से), पूर्व पत्रेक्षण (Pre-censorship) की धारा हटा दी गयी तथा उसके स्थान पर प्रेस आयुक्त की नियुक्ति की गयी, जिसका कार्य समाचार-पत्रों को विश्वसनीय एवं सही जानकारी उपलब्ध कराना था।

इस अधिनियम के विरुद्ध सारे देश में तीव्र प्रतिक्रिया व्यक्त की गयी तथा अंततः 1882 में उदारवादी गवर्नर-जनरल लार्ड रिपन ने इसे रद्द कर दिया।

Press की स्वतंत्रता के लिये किये जा रहे राष्ट्रवादी प्रयासों में बाल गंगाधर तिलक की भूमिका भी महत्वपूर्ण थी। तिलक ने 1893 में गणपति उत्सव एवं 1896 में शिवाजी उत्सव प्रारंभ करके लोगों में देशप्रेम की भावना जगाने का प्रयास किया। उन्होंने अपने पत्रों मराठा एवं केसरी के द्वारा भी अपने प्रयासों को आगे बढ़ाया। वे प्रथम कांग्रेसी थे, जिन्होंने समाज के मध्यवर्गीय लोगों, किसानों, शिल्पकारों, दस्तकारों, कारीगरों तथा मजदूरों को कांग्रेस से जोड़ने का प्रयास किया। 1896 में कपास पर उत्पाद-शुल्क आरोपित करने के विरोध में उन्होंने पूरे महाराष्ट्र में विदेशी कपड़ों के बहिष्कार का अभियान चलाया। 1896-97 में उन्होंने महाराष्ट्र में ही ‘कर ना अदायगी’ अभियान चलाया तथा किसानों से आग्रह किया कि फसल बर्बाद हो जाने की स्थिति में वे सरकार को लगान अदा न करें। 1897 में पूना में भयंकर प्लेग फैला। यद्यपि तिलक, प्लेग से निपटने के सरकारी प्रयासों के समर्थक थे किंतु इस संबंध में सरकार द्वारा उठाये गये कदमों का लोगों ने तीव्र विरोध किया। इसी संबंध में पूना में प्लेग समिति के अध्यक्ष की चापेकर बंधुओं ने गोली मारकर हत्या कर दी। सरकार की अकाल, मुद्रा एवं कर नीतियों ने भी लोगों में तीव्र असंतोष को जन्म दिया।

सरकार, लोगों में उभरती इन विद्रोही भावनाओं तथा भारतीय प्रेस के सरकार विरोधी रवैये से अत्यंत क्षुब्ध थी तथा इनके दमन के लिये उचित अवसर की प्रतीक्षा कर रही थी। अतः सरकार ने जनता के समक्ष एक उदाहरण प्रस्तुत करने के लिये तिलक को अपराधी घोषित करने का निश्चय किया। तत्पश्चात तिलक द्वारा केसरी में शिवाजी की महिमा का गुणगान करने के लिये एक कविता लिखने तथा शिवाजी महोत्सव के समय तिलक द्वारा एक भाषण में शिवाजी द्वारा अफजल खां की हत्या को सही ठहराने के आधार पर सरकार ने, रैंड की हत्या के पश्चात तिलक को गिरफ्तार कर लिया। सरकार ने उन पर आरोप लगाया कि वे शिवाजी द्वारा अफजल खां की हत्या की घटना को भारतीयों द्वारा ब्रिटिश अधिकारियों की हत्या की घटना के रूप में चित्रित कर रहे हैं। तिलक को इस अपराध का दोषी ठहराकर उन्हें 18 माह के सश्रम कारावास की सजा दी गयी। इसके पश्चात बम्बई प्रेसीडेंसी के कई अन्य संपादकों को भी विभिन्न आरोपों में गिरफ्तार किया गया तथा उन्हें कठोर सजायें दी गयीं। सरकार की इन कायरतापूर्ण कार्रवाइयों की पूरे देश में निंदा की गयी। गिरफ्तारी के पश्चात बाल गंगाधर तिलक रातोंरात राष्ट्रीय नायक बन गये तथा उन्हें ‘लोकमान्य’ (लोगों द्वारा आदरणीय एवं सम्माननीय) की उपाधि से विभूषित किया गया। पूरे देश में तिलक की प्रसिद्धि फैल गयी।

1898 में एक अधिनियम द्वारा दण्ड संहिता की धारा 124-ए को पुनः स्थापित और विस्तृत किया गया और उसमें एक नयी धारा 153-ए जोड़ दी गयी। इस धारा में यह प्रावधान था कि किसी व्यक्ति द्वारा भारत सरकार की अवमानना करने या लोगों को राज्य के विरुद्ध कार्य करने की प्रेरणा देने या समाज के विभिन्न वर्गों के बीच घृणा फैलाने की कार्यवाही को दण्डनीय अपराध माना जायेगा। इस नियम के विरुद्ध भी पूरे राष्ट्र में व्यापक प्रदर्शन किये गये। स्वदेशी एवं बहिष्कार आंदोलन तथा क्रांतिकारी राष्ट्रवाद के उदय के समय भी भारतीयों पर अनेक दमनकारी कानून आरोपित किये गये।

 

 

 

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