शुक्रवार, 4 नवंबर 2022

डॉ. होमी जहाँगीर भाभा Biography

 

टाटा फंडामेंटल रिसर्च इंस्टीट्यूट में एक शिक्षक छात्रों को परमाणु ऊर्जा के बारे में समझा रहा था। इतने में ही इस शिक्षक के निजी सहायक उन्हें धीरे से बुलाते है और कान में फुसफुसाकर कहते है कि सर, प्रधानमंत्री नेहरू जी आपसे बात करना चाहते है। इस पर वह शिक्षक अपने निजी सहायक से कहता है कि उनसे कहिये कि मैं अभी बच्चों को पढ़ा रहा हूँ, कक्षा खत्म होने तक वे इंतज़ार करें, फिर मैं उनसे बात कर लूँगा।

उपर्युक्त परिच्छेद में जिन शिक्षक महोदय की बात हो रही थी, उनका नाम है- डॉ. होमी जहाँगीर भाभा। भारत के परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम के जनक और आज़ाद भारत मे वैज्ञानिक चेतना के विकास में अहम भूमिका निभाने वाले भाभा का जन्म आज ही के दिन यानी 30 अक्तूबर 1909 को मुंबई के एक प्रतिष्ठित पारसी परिवार में हुआ था। उनके पिता जहाँगीर भाभा एक प्रसिद्ध वकील थे।

होमी जहाँगीर भाभा की प्रारम्भिक शिक्षा उनके गृहक्षेत्र मुम्बई में ही स्थित कैथेड्रल स्कूल और जॉन केनन स्कूल से संपन्न हुई थी। स्कूली शिक्षा के दौरान ही उनमें गणित और भौतिकी विषयों में रूचि उत्पन्न हो गई थी। बारहवीं की पढ़ाई उन्होंने मुम्बई के एलफिंस्टन कॉलेज से की थी। इसके उपरांत उन्होंने रॉयल इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस से बीएससी की परीक्षा उत्तीर्ण की। आगे की पढ़ाई के लिये होमी जहाँगीर भाभा लंदन चले गए।

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दरअसल उनके पिताजी चाहते थे कि वो मैकेनिकल इंजीनियर बने। इसलिये उन्होंने 1927 में कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में दाखिला लिया। हालाँकि मैकेनिकल इंजीनियरिंग में उनका दिल न लगता था। 1930 में उन्होंने कैवेंडिश लैब में दाखिला लिया। यहाँ पर समय बिताना व शोध करना उन्हें बहुत अच्छा लगता था। इस दौरान भौतिकी विषय मे शोध कार्यों को लेकर उनकी रूचि लगातार बढ़ती रही।

कॉस्मिक किरणों और उनके अनुप्रयोगों पर वो लगातार शोध कर रहे थे। इसके लिये वे जर्मनी भी गए। वर्ष 1933 में कॉस्मिक किरणों पर उनका शोधपत्र द अबज़ाॅर्पशनऑफ कॉस्मिक रेडिएशन प्रकाशित हुआ। इस शोधपत्र में उन्होंने कॉस्मिक किरणों की अवशोषक और इलेक्ट्रॉन उत्पन्न करने की क्षमताओं का प्रदर्शन किया। इसके एक वर्ष बाद यानी साल 1934 में कॉस्मिक किरणों संबंधी अपने शोधकार्य हेतु कैम्ब्रिज विश्विद्यालय से पीएचडी की उपाधि भी धारण की।

वर्ष 1934 में ही उन्हें आइज़क न्यूटन स्टूडेंटशिप भी प्राप्त हुई। इस दौरान उन्होंने रदरफोर्ड जैसे नामी वैज्ञानिक के साथ भी काम किया। वर्ष 1939 में डॉ. होमी जहाँगीर भाभा वापिस भारत आ गए। भारत आकर उन्होंने बेंगलुरू स्थित भारतीय विज्ञान संस्थान में भौतिक विज्ञान के रीडर के रूप में कार्य करना शुरू कर दिया। यहाँ पर कॉस्मिक किरणों पर नवीनतम खोज हेतु एक अलग विभाग की स्थापना भी की। इसी दौरान वर्ष 1941 में महज 31 वर्ष की आयु में उन्हें रॉयल सोसाइटी का सदस्य भी चुना गया। वर्ष 1944 में भारतीय विज्ञान संस्थान, बेंगलुरु में ही वे भौतिक विज्ञान के प्रोफेसर नियुक्त हुए।

डॉ. होमी जहाँगीर भाभा, उद्योगपति जेआरडी टाटा के अभिन्न मित्र भी थे। इन दोनों प्रबुद्ध जनों की इस प्रगाढ़ मित्रता की प्रमुख वजह इनका भारत में वैज्ञानिक चेतना के विकास को लेकर एक जैसी समझ का होना था। इसीलिये उन्होंने साथ मिलकर वर्ष 1957 में मुम्बई के नजदीक ट्रॉम्बे में टाटा फंडामेंटल रिसर्च इंस्टीट्यूट की स्थापना भी की। इस संस्थान के पहले निर्देशक के रूप में होमी जहाँगीर भाभा ने ही कार्य किया। कालांतर में इंदिरा गांधी ने इसी संस्थान का नाम बदलकर भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र कर दिया।

विज्ञान के अलावा शास्त्रीय संगीत, मूर्तिकला और नृत्यकला में भी उनकी रूचि थी। इसीलिये प्रसिद्ध वैज्ञानिक डॉ. सी. वी. रमण उन्हें भारत का लिओनार्दो दा विंची भी कहते थे। डॉ. होमी जहाँगीर भाभा द्वारा परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र मे किये गए नवीनतम अनुसंधान आधुनिक भारत के निर्माण की कहानी है। वे न सिर्फ एक कुशल शिक्षक व वैज्ञानिक थे बल्कि एक सजग राष्ट्रप्रहरी भी थे।

यही कारण है कि उन्होंने भारत से जाकर विदेशों में बस चुके वैज्ञानिकों से देश वापिस लौटने की अपील भी की। वर्ष 1947 में उनके नेतृत्व में भारत के भावी परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम की रूपरेखा तैयार की गई। इस कार्यक्रम का उद्देश्य भारत में एक सशक्त परमाणु नीति का निर्माण करना था। इस कार्यक्रम के 1 वर्ष बाद यानी वर्ष 1948 में ही भारतीय परमाणु ऊर्जा आयोग की स्थापना की जाती है।

यदि डॉ. होमी जहाँगीर भाभा के द्वारा विज्ञान के क्षेत्र मे दिये गए योगदान पर चर्चा करें तो उन्होंने भौतिकी के विभिन्न क्षेत्रों में नये-नये अनुसंधान किये हैं। भाभा ने इलेक्ट्रॉनों द्वारा पॉजिट्रॉन को बिखेरने की संभावना के लिये एक सटीक अभिव्यक्ति की रूपरेखा प्रस्तुत की। भाभा ने अपनी विज्ञान कूटनीति के माध्यम से भारत को इस क्षेत्र मे शक्ति संपन्न बनाने में भी अहम योगदान दिया।

वर्ष 1960 के दशक में विकसित देश द्वारा विकासशील देशों को लगातार ये सलाह दी जा रही थी कि इन्हें परमाणु शक्ति संपन्न होने से पहले दूसरे पहलुओं पर ध्यान देना चाहिये। विकसित देशों द्वारा उठाई जा रही इस बात का ज़ोरदार खंडन करते हुए डॉ. होमी जहाँगीर भाभा ने कहा कि विकासशील देशों को अपने यहाँ विकास कार्यों में परमाणु ऊर्जा की सहायता अवश्य लेनी चाहिये।

उनके इन्हीं प्रयासों का नतीजा था कि भारत मे वर्ष 1954 में परमाणु ऊर्जा विभाग की स्थापना की गई। इस विभाग का प्रमुख दायित्व था कि यह भारत के लिये एक सशक्त परमाणु ऊर्जा नीति की रूपरेखा निर्मित करे। डॉ. होमी जहाँगीर भाभा द्वारा किये जा रहे इन प्रयासों का ही नतीजा था कि 18 मई 1974 को भारतीय परमाणु ऊर्जा आयोग द्वारा पोखरण में भारत का पहला भूमिगत परमाणु परीक्षण संपादित किया गया। बाद में वर्ष 1998 में भारत जब पूर्णतया परमाणु शक्ति संपन्न देश बना तो इसने भारत के पड़ोसियों चीन और पाकिस्तान के साथ भी शक्ति संतुलन स्थापित किया।

भारत द्वारा परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में शक्ति संपन्न बनने का परिणाम अनेक क्षेत्रों में परिलक्षित होता है। इसने भारत की सुरक्षा व्यवस्था को और अधिक सुदृढ़ किया है। लंबी दूरी की बैलेस्टिक मिसाइलों, समुद्र आधारित परमाणु वेक्टर, सीमित बैलेस्टिक मिसाइल रक्षा कार्यक्रम का निर्माण इन्हीं की बुनियाद पर किया गया है। भाभा ने परमाणु ऊर्जा तकनीक के व्यापक कमांड और नियंत्रण पर भी काम किया है। चूँकि भारत में यूरेनियम की कमी है और यूरेनियम प्रमुख नाभिकीय ईंधन है। इसलिये भाभा ने नाभिकीय ईंधन के रूप में थोरियम के विकास हेतु भी अनुसंधान शुरू किये। इसी के बाद फर्स्ट टाइप रिएक्टर की अवधारणा सामने आई। इसमें प्लूटोनियम की मदद से थोरियम का विखंडनीय पदार्थ के रूप में विकास किया गया।

यह भाभा के प्रयासों का ही परिणाम है कि आज भारत मे 5 परमाणु शोध केंद्र है- भाभा परमाणु अनुसंधान संस्थान, मुम्बई , इंदिरा गाँधी परमाणु ऊर्जा संस्थान, कलपक्कम , उन्नत तकनीकी केंद्र, इंदौर, वेरिएबल एनर्जी साइक्लोट्रोन केंद्र, कोलकाता और परमाणु पदार्थ अन्वेषण एवं अनुसंधान निर्देशालय, हैदराबाद है। इसके अलावा सात संस्थाएँ हैं जो परमाणु अनुसंधान में सहायता करती हैं- टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च, मुम्बई , टाटा स्मारक केंद्र, मुम्बई , भौतिकी संस्थान, भुवनेश्वर , साहा भौतिकी संस्थान, कोलकाता , मेहता गणित एवं गणितीय संस्थान, इलाहाबाद , गणित विज्ञान संस्थान, चेन्नई , प्लाजमा अनुसंधान संस्थान, गांधीनगर है। आज भारत के पास 22 नाभिकीय ऊर्जा रिएक्टर है जहाँ पर 24 हजार मेगावॉट नाभिकीय विद्युत का उत्पादन होता है।

डॉ. होमी जहाँगीर भाभा को परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में दिये गए उनके अमूल्य योगदान के लिये विभिन्न पुरस्कारों से भी सम्मानित किया गया। वर्ष 1943 में उन्हें एडम्स पुरस्कार मिला। भौतिक विज्ञान के क्षेत्र में दिये गए उनके अद्वितीय योगदान हेतु उन्हें वर्ष 1948 में हॉपकिंस पुरस्कार दिया गया। वर्ष 1954 में उन्हें भारत सरकार द्वारा पद्म भूषण से भी सम्मानित किया गया। भाभा को 5 बार नोबेल पुरस्कार हेतु भी नामित किया गया। हालाँकि उन्हें यह पुरस्कार मिल न सका लेकिन विज्ञान के क्षेत्र में उनके अतुलनीय योगदान को कभी भुलाया न जा सकता है।

 

 

शनिवार, 23 अप्रैल 2022

What Was Vernacular Press Act??


 

वर्नाक्यूलर प्रेस एक्ट, 1878 (Vernacular Press Act)

1857 की महान क्रांति का एक प्रमुख परिणाम था-शासक और शासितों के बीच संबंधों में कटता। 1858 के पश्चात यूरोपीय प्रेस ने सरकार की नीतियों का समर्थन किया तथा विवादास्पद मामलों में सरकारी पक्ष का साथ दिया, किंतु देशी भाषाओं के प्रेस सरकारी नीतियों के तीव्र आलोचक थे। लार्ड लिटन की प्रतिक्रियावादी नीतियों के कारण भारतीयों में सरकार के विरुद्ध तीव्र असंतोष था। 1876-77 में भीषण अकाल से एक ओर जहां लाखों लोग मौत के मुंह से समा गये, वहीं दूसरी ओर, जनवरी 1877 में दिल्ली में भव्य दरबार का आयोजन किया गया। इन सभी कारणों से भारतीयों में उपनिवेशी शासन के विरुद्ध घृणा की भावना निरंतर बढ़ रही थी। दूसरी ओर लॉर्ड लिटन ने यह निष्कर्ष निकाला कि भारतीयों में इस असंतोष का कारण मैकाले एवं मैटकॉफ की गलत नीतियां थीं। फलतः उसने भारतीयों की भावनाओं को दबाने का निर्णय लिया।

1878 के देशी भाषा समाचार-पत्र अधिनियम (वर्नाक्यूलर प्रेस एक्ट) को बनाने का उद्देश्य, भारतीय भाषाओं के समाचार-पत्रों पर सरकारी नियंत्रण स्थापित करना तथा राजद्रोही लेखों को दबाना एवं ऐसे प्रयास के लिये समाचार-पत्रों को दंडित करना था। इस अधिनियम के मुख्य प्रावधान निम्नानुसार थे

1. जिला दण्डनायकों (District magistrate) को यह अधिकार दिया गया कि वे स्थानीय सरकार की आज्ञा से किसी भी भारतीय भाषा के समाचार-पत्र के प्रकाशक या मुद्रक को बुलाकर बंधन-पत्र (Bond) पर हस्ताक्षर करने के लिये कह सकते हैं। इस बंधन-पत्र में यह प्रावधान था कि ये प्रकाशक या मुद्रक ऐसी कोई भी सामग्री प्रकाशित नहीं करेंगे, जिससे सरकार के विरुद्ध असंतोष भड़के अथवा साम्राज्ञी की प्रजा के विभिन्न जाति, धर्म और वर्ण के लोगों के मध्य आपसी वैमनस्य बढ़े।

दण्डनायक का निर्णय अंतिम होगा तथा उसके विरुद्ध किसी प्रकार की अपील की अनुमति नहीं होगी।

3. देशी भाषा का कोई समाचार-पत्र यदि इस अधिनियम की कार्यवाही से बचना चाहे तो उसे पहले से अपने पत्र की एक प्रमाण प्रति (Proof copy) सरकारी पत्रेक्षण को देनी होगी।

इस अधिनियम को ‘मुंह बंद करने वाले अधिनियम’ की संज्ञा दी गयी। इस अधिनियम का सबसे घृणित पक्ष यह था कि-

(i) इसके द्वारा अंग्रेजी एवं देशी भाषा के समाचार-पत्रों के मध्य भेदभाव किया गया था; एवं

(ii) इसमें अपील करने का कोई अधिकार नहीं था।